मानवाधिकार एक बार फिर, सलाखों के पीछे

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मानवाधिकार एक बार फिर, सलाखों के पीछे
उमा शंकर मेहता

देश की फौलादी महिला और विश्व की सबसे अधिक लंबी भूख हडताल करने वाली महिला ईरोम चानू शर्मीला को विगत 22 अगस्त को एक बार फिर न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया है। जबकि तीन दिन पूर्व ही ईरोम को स्थानीय अदालत ने उस पर आत्म हत्या करने के प्रयास के आरोप से मुक्त कर दिया था। उस पर वहीं आरोप लगाकर उसे फिर से गिरफतार कर लिया गया है।

विगत 14 वर्षो से अनषन कर रही ईरोम का कसूर इतना है कि,वे ऐ ऐसे कानून के खिलाफ लड रही है जो वहाॅ तैनात सेना को यह अधिकार देता है कि, सेना उस क्षेत्र मे किसी भी व्यक्ति को देखते ही गोली मार सकती है, किसी के घर की तलाशी ले सकती है, और किसी को भी जब तक चाहे गिरफतार कर सकती है।

ईरोम एक मानवाधिकार कार्यकर्ता है। इस आन्दोलन की शुरुआत वर्ष 2000 से हुई, जब वहाॅ तेनात सेना ने 10 लोगों को गोलियों से सरेआम भून दिया गया।जब वे इम्फाल में बस की प्रतीक्षा कर रहे थे। जिसे‘ मालोम नर संहार का नाम दिया गया। दुःख की बात तो यह थी कि, इन दस लोगों में एक 62 साल का वृद्ध तथा 18 साल का सीनम चंद्रमणि था। जिसे वर्श 1988 में ’’ बाल बहादुरी के लिये राष्ट्रीय पुरुस्कार मिल चुका है। ईरोम शर्मीला ने इसी घटना के बाद अपना विरोध प्रकट कर अनशन प्रारंभ कर दिया। जो आज तक अनवरत है।

मानवाधिकार की रक्षा का पर्याय बन चुकी शर्मीला का अनशन अनवरत जारी है। वे मिजोरम के लोगो का मान, सम्मान और अभिमान है। वे कहती है कि, इस कानून की आड में, पूरे प्रदेष के निवासियों को शंका की दृष्टि से देखना कहाॅ तक उचित है। भारतीय संविधान की मूल भावना है कि, देश के प्रत्येक नागरिक को समान अधिकारों की सुरक्षा देना राज्य का कर्तव्य है। फिर इस तरह केकानून का क्या औचित्य है। यह संभव हा सकता है कि, यह पृथकतावादियों के लिये सुरक्षित स्थान हो, या उनकी पनाहगाह हो। मानवता का प्रथम सोपान ही कहता हेै कि, उसे जीने का अधिकार है। लेकिन उसे बिना कोई मौका दिये बगैर यह बताये कि उसका कसूर क्या है मार देना क्या उचित है।

ईरोम मणिपुर की मिटटी से जुडी हुई मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं । वहाॅ के लोगों को सेना से हो रही परेशानी , अपमान ओर प्रतारणा के विरुद्ध खडी हुई। उन्हें दुःख तो इस बात का है कि, न तो मीडिया ओर न हीं कोई वुद्धिजीवी उनके साथ सामने आने की हिम्मत कर सका। अन्ना हजारे जो बडी बडी बातें करते थे उनके बुलावे पर ईरोम से मिलने नहीं पहुॅचे अपितु अपने दो प्रतिनिधि भेज दिये। प्रश्न यह है कि, किसी बलात्कार के समाचार को प्रमुखता देने वाला मीडिया क्या इस आन्दोलन को जन आन्दोलन बनाने में अपनी भूमिका नहीं निभा सकता था? लेकिन यह उनकी व्यायसायिक मजबूरी रही होगी। जिस राज्य की जनता कोएसा कानून झेलना पडे चाहे वो कितना ही छोटा राज्य क्यों न हो, सामरिक महत्व का हवाला देकर इा प्रकार मानव अणिकारों के हनन को कदापि प्रोत्साहित नहीं किया जा सकता। ईरोम की लडाई भी यही है कि, जब सबको समान अधिकार है तो फिर इस अधिनियम की आवशयकता क्यों?

देष में यह वैधानिक प्रक्रिया प्रचलन में है कि, जब किसी अदालत द्वारा कोई निर्णय दिया जाता है तो उसके निर्णय के विरुद्ध प्रभावित पक्ष उससे उपर के न्यायालय में अपील की जा सकती है तो फिर ईरोम को अचानक गिरफतार क्यों किया गया? और इसका कोई कारण भी नहीं बताया गया है। अभी वे फिलहाल 15 दिन की न्यायिक हिरासत में हैं। इस बार उनके साथ अनेक सामाजिक संगठन है। विगत लोक सभा चुनाव के समय इरोम का ख्याल कई राजनैतिक पाटियों को आया और उन्होनें ईरोम केा टिकिट देने का प्रस्ताव किया जिनमें कांग्रेस और आम आदमी पार्टी प्रमुख है। लेकिन उन्होेने मना कर दिया। इसी प्रकार तृणमूल कांग्रेस ने भी उनको यह कहकर झांसे में लेने की कोशिश की लेकिन दृढ मानसिकता की धनी ईरोम पर इसका कोई असर नहीं हुआ। किसी भी प्रदेष में रहने वाले लोगों को जब शंका की निगाह से देखा जाकर ऐसे कानुन को लागू किया जाता है तो यह उसका अपमान है। शर्मीला ईरोम भी इसी बात को लेकर आन्दोलित है।

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